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Showing posts from April, 2020

ग़ज़ल

जो बात अहल-ए-हाजत करती है  तेरे दर से हो-के गुज़रा करती है , सदाक़त और भी मुखलिफ़ है वाइज़ , तेरी हर बात पर तब्सिरा करती है  वो लड़की परेशां है सारे ज़माने से , अपने आप से ही तज़किरा करती है , तमाम आसमां खुला है उसके लिए , वो फिर भी छतों में फ़िरा करती है , रास्तों से वो गुज़रे तो कभी देखना , तमाम नज़रों से कैसे घिरा करती है , रिवायतें तोड़ना यूँ आसां नहीं "माधव" रस्म-ओ-राह कई डोर में फ़िरा करती है ।।