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ग़ज़ल

जो बात अहल-ए-हाजत करती है 
तेरे दर से हो-के गुज़रा करती है ,

सदाक़त और भी मुखलिफ़ है वाइज़ ,
तेरी हर बात पर तब्सिरा करती है 

वो लड़की परेशां है सारे ज़माने से ,
अपने आप से ही तज़किरा करती है ,

तमाम आसमां खुला है उसके लिए ,
वो फिर भी छतों में फ़िरा करती है ,

रास्तों से वो गुज़रे तो कभी देखना ,
तमाम नज़रों से कैसे घिरा करती है ,

रिवायतें तोड़ना यूँ आसां नहीं "माधव"
रस्म-ओ-राह कई डोर में फ़िरा करती है ।।

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